वृंदावन में बनारस की तर्ज़ पर कॉरिडोर को लेकर क्यों है आक्रोश

मोदी जी से-योगी जी से जाकर कहना, हम हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं, हमें यहाँ से ना हटाएँ, हमें अपने बिहारी जी के दर्शन करने होते हैं, बुढ़ापे में पैर भी नहीं चलते हैं, हम कहाँ जाएँगे
वृंदावन में बनारस की तर्ज़ पर कॉरिडोर को लेकर क्यों है आक्रोश

ये है मथुरा की एक बुज़ुर्ग महिला राधा रानी तिवारी के शब्द.

बांके बिहारी मंदिर तक जाने वाले गलियों के अधिकतर बाशिंदों की यही भावना है. यहाँ आप किसी बच्चे से बात करें, नौजवान से बात करें, बुज़ुर्ग से बात करें या महिला से बात करें- बस यही शब्द सुनाई देते हैं, "हमें हमारे ठाकुरजी से दूर मत भेजो, हम उनके बिना नहीं रह पाएँगे."

उत्तर प्रदेश सरकार वाराणासी के काशी विश्वनाथ मंदिर की ही तरह वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर तक भी नया कॉरिडोर बनाना चाहती है ताकि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएँ मिले और मंदिर में दर्शन आसानी से हो जाएँ.

सरकार इसके लिए मंदिर के आसपास की पाँच एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण करना चाहती है और यहाँ पर भव्य कॉरिडोर बनाना चाहती है.

ये कॉरिडोर कैसा होगा और कब तक बनकर तैयार होगा, इस बारे में उत्तर प्रदेश सरकार या मथुरा प्रशासन की तरफ़ से कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.

वहीं ब्रज तीर्थ विकास परिषद उपाध्यक्ष शैलजा कांत मिश्रा कहते हैं, "ये मामला अभी अदालत में है इसलिए बहुत अधिक इस बारे में नहीं कहा जा सकता है."

शैलजा कांत मिश्रा कहते हैं, "बड़ी तादाद में श्रद्धालु वृंदावन आ रहे हैं. सरकार उन्हें सुविधाएँ देना चाहती है, जिसके लिए कॉरिडोर प्रस्तावित है. सरकार वृंदावन की विरासत को बचाते हुए, वहाँ काम कर रहे सेवायतों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए और आसपास रहने वाले लोगों को हितो को ध्यान में रखते हुए ही काम करेगी."

कुछ दिन पहले नगर निगम ने इलाक़े में पैमाइश की कार्रवाई की थी, जिसके बाद से यहाँ डर, बेचैनी और आक्रोश है.

बीते कई दिनों से यहाँ के बाशिंदे सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

20 अगस्त 2022 को जन्माष्टमी के मौक़े पर बांके बिहारी मंदिर में भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी. इस दौरान मची भगदड़ में दो लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हुए थे.

वरिष्ठ पत्रकार और मथुरावासी आनंद शर्मा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की और मंदिर में भीड़ के प्रबंधन को बेहतर किए जाने की मांग की, ताकि आगे जनहानि ना हो.

इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में 27 सितंबर 2022 को पेश शपथ पत्र में बताया कि सरकार मंदिर के बेहतर प्रबंधन के लिए एक नया ट्रस्ट गठित करना चाहती है और यात्रियों को बेहतर सुविधाएँ देने के लिए बांके बिहारी मंदिर के इर्द-गिर्द कॉरिडोर बनाना चाहती है जो पाँच एकड़ में होगा.

सरकार ने शपथ पत्र में हाई कोर्ट में बताया कि भूमि के अधिग्रहण के लिए श्री बांके बिहारी मंदिर फंड का इस्तेमाल किया जाएगा. वहीं आसपास पार्किंग और अन्य सुविधाओं के विकास पर ख़र्च राज्य सरकार करेगी.

सरकार ने जो नया ट्रस्ट प्रस्तावित किया है, उसके सदस्यों को उत्तर प्रदेश सरकार ही नामांकित करेगी, जिनकी संख्या 11 होगी. इसमें मंदिर के सिर्फ़ दो ही गोस्वामी नामांकित होंगे.

यही नहीं हादसे के बाद यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह की अध्यक्षता में गठित जाँच समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में मंदिर आने-जाने के लिए कॉरिडोर बनाने की सलाह दी थी.

इस जाँच रिपोर्ट में यमुना पर पुल बनाकर यमुनापार क्षेत्र में व्यापक यात्री सुविधाएँ विकसित करने की सिफ़ारिश भी की गई थी.

इसके अलावा बांके बिहारी मंदिर तक पहुँचने वाली सभी गलियों को 9 मीटर तक चौड़ा करने की सिफ़ारिश भी की गई थी.

आनंद शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के धनकोष का इस्तेमाल क्षेत्र के विकास के लिए करने का सुझाव भी दिया है.

याचिकाकर्ता आनंद शर्मा ने बीबीसी से कहा, "मंदिर में कुप्रबंधन है, हम चाहते हैं कि ये ठीक हो. जब मंदिर बना था तब इसकी क्षमता सिर्फ़ 400 लोगों की थी, लेकिन अब सप्ताहांत में यहाँ एक लाख से अधिक लोग पहुँचते हैं और यहाँ हमेशा भगदड़ की स्थिति रहती है. मैंने यही मांग की है कि यहाँ व्यवस्था बेहतर हो ताकि लोगों को सुविधाएँ मिलें और जानहानि ना हो."

कैसा होगा कॉरिडोर?

कॉरिडोर का अधिकारिक नक़्शा अभी जारी नहीं किया गया है ना ही इस बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है.

बीबीसी को भरोसेमंद सूत्रों से पता चला है कि पाँच एकड़ में बनने वाले कॉरिडोर में 10 हज़ार तक श्रद्धालुओं के लिए जगह होगी.

यमुना नदी के किनारे रिवर फ़्रंट बनाया जाएगा, जहाँ से मंदिर तक कॉरिडोर होगा.

जिन मकानों को हटाया जाएगा, उन्हें नगर निगम ने चिन्हित कर लिया है.

हालाँकि कॉरिडोर को लेकर कोई भी काम अब अदालत के निर्णय के बाद ही होगा.

क्यों आक्रोशित हैं मंदिर से जुड़े लोग?

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रजत गोस्वामी

बांके बिहारी मंदिर के गोस्वामी, पुरोहित और स्थानीय लोग सरकार के कॉरिडोर बनाने के फ़ैसले का कड़ा विरोध कर रहे हैं.

मंदिर को गोस्वामियों ने अपने ख़ून से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम चिट्ठी लिखकर कॉरिडोर न बनाने की अपील की है.

इसकी वजह बताते हुए पूर्व में मंदिर प्रबंधन से जुड़े रहे और सुप्रीम कोर्ट में मंदिर के ख़ज़ाने की रक्षा के लिए याचिका दायर करने वाले रजत गोस्वामी कहते हैं, "सरकार पाँच एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर रही है और उसका मुआवज़ा मंदिर के फंड से किया जाएगा. हमारा इसे लेकर भी विरोध है. सरकार मंदिर की मौजूदा प्रबंध समिति को भंग करके नई प्रबंध समिति बनाने जा रही है, हम इसका भी विरोध कर रहे हैं."

रजत गोस्वामी कहते हैं कि सरकार मंदिर के ख़ज़ाने को अपने नियंत्रण में लेना चाहती है."

उत्तर प्रदेश सरकार का तर्क है कि कॉरिडोर बनाने से यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएँ मिलेंगी और उन्हें मंदिर में दर्शन करने में आसानी होगी.

लेकिन मंदिर से जुड़े लोग इस तर्क को ख़ारिज करते हैं. मंदिर के राजभोग आनंद उत्सव सेवा अधिकारी ज्ञानेंद्र आनंद किशोर गोस्वामी कहते हैं, "काशी में सरकार ने कॉरिडोर बनाया है, कॉरिडोर में सिर्फ़ सेल्फ़ी प्वाइंट बने हैं. भगवान शिव जी का दर्शन आज भी गिनती के लोग ही कर सकते हैं, वहाँ खड़े होने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है, आइए दूर से देखिए और चले जाइए. क्या यहाँ भी सेल्फ़ी प्वाइंट बनाना है?"

"सरकार यहाँ की कुंज गलियों के भाव को ख़त्म करना चाहती है, ब्रजवासियों पर कुठारघात कर उन्हें यहाँ से निकालना चाहती है. सरकार ब्रजवासियों के घर तोड़कर उन्हें यहाँ से उखाड़ बाहर फेंकने का प्रवाधान कर रही हैं. यहाँ अनेकों मंदिर हैं, घर-घर में मंदिर हैं, इन मंदिरों को तोड़ने की व्यवस्था सरकार कर रही है."

'हमारी आस्था पर चोट'

सुमित मिश्रा पैतृक परंपरा से बांके बिहारी मंदिर के पुरोहित हैं. सुमित का घर बिलकुल मंदिर से सटकर बना है.

अपनी बालकनी से मंदिर के शिखर को दिखाते हुए सुमित कहते हैं, "हम सुबह उठते ही बांके बिहारी के शिखर के दर्शन करते हैं, जब सोते हैं तब शिखर के दर्शन करते हैं. हम किसी भी क़ीमत पर अपने बांके बिहारी के इस दर्शन के आनंद को नहीं छोड़ेंगे. यह हमारा जन्माधिकार है जो कोई हमसे नहीं छीन सकता."

कॉरिडोर के लिए कुल कितने घर तोड़े जाएँगे, अभी ये स्पष्ट नहीं है. नगर निगम ने इलाक़े की पैमाइश की है, जिनमें अब तक क़रीब 300 घरों को चिन्हित किया गया है.

जो कॉरिडोर प्रस्तावित है, वो बांके बिहारी मंदिर से युमना तट तक जाएगा.

अपनी छत से यमुना तट दिखाते हुए सुमित कहते हैं, "यहाँ से सिर्फ 200 मीटर दूर यमुना तट है जिसके दूसरे किनारों पर सैकड़ों एकड़ भूमि ख़ाली पड़ी है, वहाँ यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय क्यों नहीं बनाया जा रहा है. वहाँ यात्रियों को रोककर सीमित संख्या में लोगों को यहाँ भेजा जाए. इससे यहाँ की कुंज गलियाँ भी बच जाएँगी और यात्रियों को भी सहूलियत होगी."

बांके बिहारी मंदिर के चारों तरफ़ पतली-पतली गलियाँ हैं. कुछ की चौड़ाई एक मीटर से भी कम है तो कुछ तीन-चार मीटर तक चौड़ी हैं. यहाँ रहने वाले लोगों की आस्था है कि यही वो गलियाँ हैं, जिनमें कभी भगवान कृष्ण खेला करते थे.

इन गलियों में मकानों पर अब लाल निशान लगें हैं जिनसे यहाँ रहने वाले लोगों में बेचैनी और अनिश्चितता है.

अपने घर के बाहर झाँकती एक महिला कहती हैं, "हमें डर है कि हमारा घर भी कहीं कॉरिडोर में ना आ जाए. हम अपना घर दे नहीं सकते क्योंकि बिहारी जी यहाँ से हमारे बहुत पास हैं, यहाँ से उठाकर हमें बाहर पटक देंगे तो हम वहाँ से रोज़ यहाँ कैसे आएँगे?"

स्थानीय युवा कुंज बिहारी पाठक कहते हैं, "अभी तक नगर निगम प्रशासन या किसी भी सरकारी विभाग ने स्थिति स्पष्ट नहीं की है. ये नहीं बताया है कि ये निशान किस मक़सद से लगाए गए हैं. सड़कें चौड़ी होंगी, घरों को तोड़ा जाएगा, क्या होगा ये किसी को नहीं पता है. लेकिन हर ब्रजवासी ये चाहता है कि इन कुंज गलियों के अस्तित्व को ना मिटाया जाए. वृंदावन की पहचान इन्हीं गलियों से है. ये गलियाँ नहीं होंगी, तो वृंदावन की अपनी अलग पहचान भी नहीं होगी."

स्थानीय लोगों का कहना है कि वो अपने घरों और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाएँगे.

स्थानीय कारोबारी और बांके बिहारी व्यापारिक एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष अमित गौतम कहते हैं, "ये हेरिटेज़ सिटी है, वृंदावन कुंज गलियों की नगरी है, अगर इसकी पौराणिक छवि को ही नष्ट कर दिया जाएगा, तो यहाँ आने वाले पर्यटक क्या देखने आएँगे, क्या वो इमारतों को या मॉल को देखने आएँगे, उन्हें तो वो कहीं भी देख लेंगे."

कॉरिडोर की ज़द में कई दुकाने भी आएँगी. श्वेता बंसल का परिवार मंदिर के पास कपड़ों की दुकान चलाता है.

श्वेता कहती हैं, "सरकार कह रही है कि मुआवज़ा देंगे, लेकिन हम मुजावज़े को कितने दिन खाएँगे. यहाँ हमारे घर हैं, परिवार हैं, दुकानें हैं, हमारे सपने, हमारी ज़िंदगी इनसे जुड़ी है, उसका क्या होगा. कितनी ही कर्मचारी यहाँ काम करते हैं, उनका क्या होगा?"

'मस्जिद बाक़ी है, मंदिर मलबे का ढेर हैं' - BBC News हिंदी

'आस्था और धर्म की महिमा और माया'

राजधानी दिल्ली से क़रीब 150 किलोमीटर दूर और ब्रज के हृदय में बसा वृंदावन अपनी अलग पहचान रखता है.

यमुना किनारे से बांके बिहारी मंदिर की तरफ़ जाती पतली-पतली गलियों और मंदिर के आसपास की सड़कों पर पूजा सामग्री, मिठाइयों और चाट की दुकाने सजी हैं. यहाँ के अपने अलग रंग हैं.

अधिकतर ट्रैफ़िक को शहर के बाहरी क्षेत्र में रोक दिया जाता है. यहाँ आने वाले श्रद्धालु पैदल मंदिर की तरफ बढ़ते हुए रास्ते में दुकाने पर रुकते हैं, सामान ख़रीदते हैं, चाय पीते हैं और स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेते हैं.

रास्ते में जगह-जगह पीले रंग से चेहरे पर राधे-राधे के छापे लगाने वाले बच्चे और महिलाएँ श्रद्धालुओं को रोक लेते हैं और 10 रुपए के बदले छापा लगा देते हैं.

वृंदावन के चारों तरफ़ परिक्रमा मार्ग हैं, जहाँ देशभर से आए कई कृष्ण भक्त नंगे पैर परिक्रमा करते दिख जाते हैं.

कुछ यहाँ की धरती पर माथा टेक-टेक कर तो कुछ यहाँ की मिट्टी को चूम-चूम कर आगे बढ़ते हैं. यहाँ धर्म और आस्था की महिमा और माया नज़र आती है.

कुछ श्रद्धालु अकेले अपनी भक्ति में खोए, तो कुछ समूहों में करतल ध्वनि बजाते हुए राधे-राधे कहते हुए आगे बढ़ते हैं.

वृंदावन के लोगों को लगता है कि अगर कॉरिडोर बना, तो यहाँ के ये रंग-रूप और संस्कृति समाप्त हो जाएगी.

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वृंदावन के बंदर

क्या चाहते हैं पर्यटक?

सुबह होते ही हज़ारों पर्यटकों की भीड़ बांके बिहारी मंदिर की तरफ़ बढ़ती है. कई गलियों में भीड़ इतनी है कि क़दम रखना मुश्किल है.

दिल्ली से अपने परिवार के साथ आए एक श्रद्धालु सुनील मेहतानी कॉरिडोर के सवाल पर कहते हैं, "हमारी आस्था बनी रहनी चाहिए. अगर मंदिर के अंदर सही दर्शन की व्यवस्था ठीक हो जाए तो भी बेहतर होगा. कॉरिडोर से दर्शन की समस्या ठीक नहीं होगी, कॉरिडोर ना भी बने, तब भी चलेगा लेकिन मंदिर के भीतर व्यवस्था ठीक होनी चाहिए. हम एक नंबर गेट से दाख़िल होते हैं और 5 नंबर से निकलना पड़ता है. जूते उतारने की व्यवस्था नहीं है. मंदिर की व्यवस्था ठीक करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए."

पूनम शिमला से अपने परिवार के साथ वृंदावन आई हैं. वो हर साल यहाँ आती हैं. पूनम कहती हैं, "मुझे वो आनंद नहीं आएगा, जो अभी आता है. गलियों में घूम-घूम कर जाना, छोटी-छोटी दुकानों पर रुकना, सामान ख़रीदना बहुत अच्छा लगता है. अगर विकास ही देखना है तो फिर बड़े-बड़े मॉल में चले जाओ, जो यहाँ का नज़ारा है, वो अलग है, कॉरिडोर बना तो ये वो बात नहीं रह जाएगी. भगवान में हमारी भक्ति है, हम फिर यहाँ आएंगे, लेकिन वो आनंद नहीं आएगा."

हालाँकि सभी की राय एक जैसी नहीं हैं. बैंक से रिटायर और पिछले चार सालों से वृंदावन में बसे खुशीराम बंसल कहते हैं, "मैं 40 सालों से वृंदावन आ रहा हूँ. बैंक से रिटायर होने के बाद यहीं बस गया हूं. रोज़ मंदिर दर्शन करने जाता हूँ. कॉरिडोर बनने से राहत होगी, मैं इसे लेकर बहुत प्रसन्न हूँ. कॉरिडोर बनने के बाद 10 गुणा अधिक लोग वृंदावन आएँगे. सरकार जो घर तोड़ेगी उन्हें मुआवज़ा दे रही है, बहुत अधिक हो हल्ला नहीं होना चाहिए. "

अनियंत्रित विकास, क्या बचा है वृंदावन?

वृंदावन के नाम को लेकर कई कहानियाँ हैं. कुछ लोग मानते हैं कि एक वृंदा नाम की गोपी थी, जो एक राजा की बेटी थीं, उन्होंने कृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की. उन्हीं के नाम पर इस वन क्षेत्र का नाम वृंदावन हुआ.

संस्कृत में वृंद का अर्थ समूह भी होता है, ऐसे में वनों के समूह को भी वृंदावन कहा गया है. वृंदा का एक और अर्थ होता है तुलसी, इसलिए ये भी माना गया कि ये तुलसी का वन था.

वृंदावन का अर्थ चाहें जैसे भी निकाला जाए, लेकिन इसमें वन यानी जंगल ज़रूर हैं, जो अब वृंदावन में कम ही नज़र आते हैं.

इस्कॉन मंदिर, कृपालु महाराज, नीम करौली बाबा और अन्य धर्मगुरुओं की वजह से भी वृंदावन आस्था का केंद्र बन गया है और बड़ी तादाद में श्रद्धालु यहाँ पहुँच रहे हैं.

इन श्रद्धालुओं के लिए होटल और अन्य सुविधाएँ विकसित करने के लिए नए निर्माण शहर में हो रहे हैं.

वृंदावन अब कंक्रीट का जंगल नज़र आता है, जो अब अपने दायरे के बाहर फैल रहा है. इस तीव्र विकास की सबसे बड़ी क़ीमत यहाँ के जंगलों ने ही चुकाई है.

शहर के जाने माने कारोबारी और वृंदावन के तीर्थ पुरोहित कपिल देव उपाध्याय कहते हैं, "स्मृति के रूप में कुछ वन ज़रूर बचे हैं, लेकिन अधिकतर वन अब समाप्त हो गए हैं, वृंदावन की आबादी तेज़ी से बढ़ी है, ऐसे में सबसे बड़ा कुठाराघात वनों पर ही हुआ है."

कपिल देव उपाध्याय कहते हैं, "एक समय था, जब ब्रज में एक कहावत मशहूर थी कि 'बीत गई जनमाष्टमी, पड़न लगी ठंड, भजो राधे घुमंत.' इसका अर्थ था कि जन्माष्टमी तक तो यहाँ तीर्थ यात्री आते थे, उसके बाद ठंड पड़ने लगती थी और यहाँ तीर्थयात्रियों का अकाल पड़ जाता था, तब हम जैसे ब्राह्मण लोग वृंदावन में नहीं ठहरते थे बल्कि घूम-घूमकर जजमानों के पास जाते थे और दक्षिणा मांगते थे, उसी से ही पंडित परिवारों का गुज़ारा होता था. किसी ज़माने में यहाँ हज़ारों में लोग आते थे, अब लाखों-करोड़ों में आ रहे हैं. जिस रफ़्तार से यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ी है, उससे स्थिति विस्फोटक हो गई है."

वृंदवान में जिससे भी बात करो, वो कुंज गलियों की बात ज़रूर करता है. गुंज का अर्थ होता है छाड़ और लताओं से बनीं गलियाँ. बांके बिहारी मंदिर के आसपास रहने वाले लोग तर्क देते हैं कि उन कुंज गलियों को संरक्षित किया जाना चाहिए जहाँ कृष्ण ने लीलाएँ कीं.

विकल्प क्या हैं?

सरकार ने काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर जब बनाना शुरू किया, तब वाराणासी में भी विरोध हुआ था. लेकिन आख़िरकार घर और मंदिर तोड़े गए और कॉरिडोर के लिए जगह बनाई गई. वृंदावन में भी बहुत से लोगों को लगता है कि विरोध के बावजूद सरकार कॉरिडोर बना ही लेगी.

इसे समय की आवश्यकता बताते हुए कपिल देव उपाध्याय कहते हैं, "जिस संख्या में यात्री आ रहे हैं, उन्हें मौजूदा मूलभूत ढाँचे से सुविधा नहीं दी जा सकती हैं. ऐसे में दो ही विकल्प बचते हैं, या तो बांके बिहारी की प्रतिमा को वहाँ से कहीं और खुली जगह पर स्थापित किया जाए, या फिर बांके बिहारी मंदिर तक रास्तों का विस्तार किया जाए. विकास की इस प्रक्रिया में टूट फूट होगी, लेकिन दूसरा कोई विकल्प नज़र नहीं आता है."

"बहुत से लोग इससे प्रभावित होंगे, उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है, मेरी बहन का भी मकान कॉरिडोर के दायरे में आ रहा है. बहुत से ऐसे लोग हैं, लेकिन बड़े मक़सद के लिए ये त्याग तो करना ही होगा. अन्यथा वृंदावन में हालात अनियंत्रित हो जाएँगे."

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