NSA अजीत डोभालः इंदिरा हों या मोदी सबका जीता दिल, धर्म बदलकर 7 साल रहे पाकिस्तान में

पढ़ाई से लेकर 32 साल के जासूसी करियर तक में उन्होंने एक से बढ़कर एक उपलब्धियां हासिल की और अपने हैरतअंगेज कारनामों से वे देश के जेम्स बांड कहे जाने लगे।
NSA अजीत डोभालः इंदिरा हों या मोदी सबका जीता दिल, धर्म बदलकर 7 साल रहे पाकिस्तान में
NSA Ajit Doval

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, मोदी सरकार में सबसे पावरफुल ब्यूरोक्रेट्स में एक हैं। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के साथ काम कर चुके हैं। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RA&W) के प्रमुख रहे अमरजीत सिंह दुलत ने अपनी आत्मकथा 'A Life in the Shadows: A Memoir में अजीत डोभाल के बारे में काफी कुछ लिखा है। इसके अलावा, द कारवां मैग्जीन के पूर्व डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर प्रवीन दोंथी की किताब 'Undercover -Ajit Doval in Theory and Practice' में भी उन्होंने अजीत डोभाल के बारे में बहुत विस्तार से लिखा है।

लीक से हटकर काम करते हैं डोभाल दुलत अपनी किताब में लिखते हैं कि वर्ष 2006 में डोभाल ने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को एक इंटरव्यू दिया था। इसमें अजीत डोभाल ने कहा था कि एक बार मैंने लालडेंगा के मिज़ो नेशनल फ्रंट के विद्रोहियों को अपने घर खाने पर बुलाया। मैंने उन्हें आश्वासन दिया था कि वो सुरक्षित रहेंगे। उस दौरान मेरी पत्नी ने उनके लिए सूअर का मांस बनाया था, हालांकि उससे पहले मेरी पत्नी ने कभी सूअर का मांस नहीं बनाया था।" दुलत लिखते हैं कि ये विवरण बताता है कि जरूरत पड़ने पर डोभाल लीक से हटकर काम कर सकते थे। पत्रकार सैकत दत्ता अपने एक लेख में लिखते हैं कि मिजो नेशनल फ्रंट के नेता लालडेंगा ने एक बारकिसी इंटरव्यू में बताया था कि मेरे पास सात कंमाडर थे, पर अजीत डोभाल ने मोर्चा संभाला और उनके 7 में से 6 कमांडरों को अपने साथ जोड़ लिया। इसके बाद लालडेंगा ने बताया कि उनके पास शांति समझौते पर बातचीत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।"

डोभाल की उपलब्धियां 
अजीत डोभाल भारत के इकलौते ऐसे नौकरशाह हैं जिन्हें कीर्ति चक्र और शांतिकाल में मिलने वाले गैलेंट्री अवॉर्ड से नवाजा गया है। डोभाल कई सिक्युरिटी कैंपेन का हिस्सा रहे हैं। इसी के चलते उन्होंने जासूसी की दुनिया में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अजीत डोभाल का जन्म 1945 को पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। उनकी पढ़ाई अजमेर मिलिट्री स्कूल में हुई है। केरल के 1968 बैच के IPS अफसर डोभाल अपनी नियुक्ति के चार साल बाद 1972 में ही इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) से जुड़ गए थे।

उन्होंने अपना ज्यादातर समय खुफिया विभाग में जासूसी करके गुजारा है। वह 2005 में आईबी की डायरेक्टर पोस्ट से रिटायर हुए हैं। उन्होंने अपने पूरे करियर में सिर्फ सात साल ही पुलिस की वर्दी पहनी है। वह मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ भी रह चुके हैं। डोभाल को जासूसी का लगभग 37 साल का अनुभव है। वह 31 मई 2014 को देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने। 

पाकिस्तान और आतंकियों को हर बार दिया चकमा 
आपको जानकर हैरानी होगी कि खुफिया एजेंसी रॉ के अंडर कवर एजेंट के तौर पर डोभाल सात साल पाकिस्तान के लाहौर में एक पाकिस्तानी मुस्लिम बनकर रहे थे। जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर हुए आतंकी हमले के काउंटर ऑपरेशन ब्लू स्टार में जीत के नायक बने। अजीत डोभाल रिक्शा वाला बनकर मंदिर के अंदर गए और आतंकियों की जानकारी सेना को दी, जिसके आधार पर ऑपरेशन में भारतीय सेना को सफलता मिली।

1999 में कंधार प्लेन हाईजैक के दौरान ऑपरेशन ब्लैक थंडर में अजीत डोभाल आतंकियों से निगोसिएशन करने वाले मुख्य अधिकारी थे। जम्मू-कश्मीर में घुसपैठियों और शांति के पक्षधर लोगों के बीच काम करते हुए कई आतंकियों को सरेंडर कराया। अजीत डोभाल 33 साल तक नॉर्थ-ईस्ट, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में खुफिया जासूस भी रहे। वह 2015 में मणिपुर में आर्मी के काफिले पर हमले के बाद म्यांमार की सीमा में घुसकर उग्रवादियों के खात्मे के लिए सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन के हेड प्लानर रहे।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर-टू में बने रिक्शावाले अजीत डोभाल की ऑपरेशन ब्लैक थंडर-टू में भूमिका के बारे में यतीश यादव 'न्यू इंडियन एक्सप्रेस' में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखते है, "1988 में स्वर्ण मंदिर के आसपास रहने वाले स्थानीय निवासियों और खालिस्तानी लड़ाकों ने एक व्यक्ति को रिक्शा चलाते हुए देखा था। उस रिक्शा वाले ने उन खालिस्तानी लड़ाकों को विश्वास दिला दिया था कि वो ISI का सदस्य है और उसे खासतौर से उनकी मदद करने के लिए भेजा गया है।

ब्लैक थंडर ऑपरेशन शुरू होने से दो दिन पहले वो रिक्शा चलाने वाला स्वर्ण मंदिर में घुसा और वहां से महत्वपूर्ण जानकारी लेकर बाहर लौटा। इस दौरान उसने पता लगाया कि मंदिर के अंदर कितने चरमपंथी थे। ये रिक्शेवाला और कोई नहीं अजीत डोभाल थे।" जब कांधार गए थे अजीत डोभाल दुलत अपनी किताब में एक अन्य किस्से का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि "जब 1999 में भारतीय विमान को अपहरण कर कांधार ले जाया गया तो उस समय NSA ब्रजेश मिश्रा ने मुझसे और श्यामल दत्ता से कहा कि वहां बातचीत करने के लिए अपने लोग भेज दो। मेरी नजर में इस काम के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति सी.डी. सहाय और आनंद आर्नी थे। क्योंकि वो दोनों ऑपरेशनल अफसर थे और अफगानिस्तान को अच्छी तरह से समझते थे। पर श्यामल दत्ता ने कहा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो में इस काम को अजीत डोभाल और नहचल संधू से बेहतर कोई नहीं कर सकता। इन दोनों को ही कांधार भेजा गया।"

पीओके में ऑपरेशन के पीछे बड़ी भूमिका, 1991 में रोमानियाई राजनयिक को बचाया
1991 में खालिस्तान लिबरेशन फ्रंट द्वारा अपहृत किए गए रोमानियाई राजनयिक लिविउ राडू को बचाने की सफल योजना बनाने वाले अजीत डोभाल ही थे। डोभाल ने पाकिस्तान और ब्रिटेन में राजनयिक जिम्मेदारियां संभालीं। एक दशक तक उन्होंने खुफिया ब्यूरो की ऑपरेशन शाखा का नेतृत्व किया।

पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर आंतकियों के कैंप को नष्ट करने के ऑपरेशन के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बड़ा हाथ है। पीओके में अंजाम दिए गए सर्जिकल ऑपरेशन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अहम भूमिका निभाई। अजीत डोभाल कब कौन से ऑपरेशन को अंजाम देंगे इस बारे में तब ही पता चलता है जब ऑपरेशन पूरा हो जाता है। कुछ ऐसी भूमिका उन्होंने अनुच्छेद 370 के हटाने में भी निभाई। 

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